डॉ. पी. सी. चौरसिया, डॉ. ओकेश चंद्राकर एवं डॉ. अनुराग
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय
कृषि महाविद्यालय एवं अनुसन्धान केंद्र, महासमुंद (छ.ग.)
प्रस्तावना:-
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शुष्क क्षेत्रों में उगाये जाने वाले फलों में बेर का विशेष स्थान है। बेर के पौधे अपने आपको विपरीत परिस्थितियों में ढालने की अद्भुत क्षमता रखते हैं, जिसके फलस्वरूप ये शुष्क एवं अर्ध शुष्क क्षेत्र जहां वार्षिक वर्षा बहुत कम एवं अनियमित तथा सूर्य विकिरण अधिक होता है, वहंांॅ सफलता पूर्वक फलोत्पादन किया जा सकता हैं। बेर का फल पौष्टिक तत्वों से परिपूर्ण है जिसमें विटामिन, खनिज लवण शर्करा इत्यादि प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। बेर के फलों को ताजा एवं परिरक्षित पदार्थ के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसके फलों से शर्बत, जैम, मुरब्बा, कैण्डी, सूखे बेर, इत्यादि परिरक्षित पदार्थ बनाये जा सकते हैं। फल सेवन करने से रक्त साफ होता है और पाचन क्रियाठीक रहती है। कच्चे फल के सेवन से कफ बढ़ता है जबकि पका हुआ फल शीतल, पचनीय और शक्तिवर्धक आहार माना गया है।
भूमि एवं जलवायु-
बेर की खेती साधारणतः सभी प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है। इसे गहरी कंकरीली-पथरीली, बलुई, काली, लाल और चिकनी मिट्टी में सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। बेर एक सहिष्णु पौधा है अतः इसे क्षारीय एवं लवणीय व परती अथवा बंजर भूमि में भूमि सुधारक का प्रयोग करके सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है।
एप्पल बेर की उन्नत किस्में-
देश के विभिन्न भागों में बेर की अनेक प्रजातियां पायी जाती हैं जिनमें झरबेर, बोरड़ी, कलमी बेर आदि प्रमुख हैं। अच्छी गुणवत्ता के फल उत्पादन के लिये क्षेत्र के अनुसार सही व उन्नत किस्मों का चयन करना जरूरी है। वर्तमान में बेर की लगभग 300 किस्में हैं जिनमें से कुछ किस्में व्यवसायिक दृष्टि से खेती के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं।
एप्पल बेर (थाई बेर)
यह बेर की एक संकर किस्म है, जिसे उत्पादन देने में अधिक समय नहीं लगता है। इसे एप्पल बेर के नाम से भी पुकारते है। इसके एक पेड़ से 100 किलो का सालाना उत्पादन मिल जाता है, और अगर ठीक से देख-रेख की जाए तो वर्ष में दो बार भी फल ले सकते है। इस किस्म के पेड़ की खासियत यह है, कि इसके पेड़ में काटे नहीं होते है।
पौध रोपण
पौध लगाने का सबसे उपयुक्त समय वर्षा ऋतु (जुलाई-अगस्त) है। सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो तो बसंत ऋतु (फरवरी-मार्च) में भी पौध रोपण किया जा सकता है। रेखांकन करने के बाद 6 ग 6 मीटर की दूरी पर 60 ग 60 ग 60 सेमी. आकार के गड्ढे वर्षा ऋतु के पूर्व तैयार कर लेते हैं। रोपाई के एक माह पहले इन गड्ढों में 2 टोकरी सड़ी हुई गोबर की खाद व 30 ग्राम फिफ्रोनिल चूर्ण को मिट्टी में मिलाकर अच्छी तरह भर देते हैं। रोपण के पश्चात् हल्की सिंचाई अत्यंत आवश्यक होती है।
सिंचाई व जल प्रबंध
बेर के नये पौधे स्थापित करने के लिये प्रथम वर्ष में सिचाई की अधिक आवश्यकता पड़ती है। एक बार जब पौधे अच्छी तरह से जग जायें तब असिंचित दशा में भी बेर के पौधों से अच्छी उपज मिल जाती है। सूखा पड़ने की स्थिति में भी अन्य फलदार फसलों की तुलना में बेर से अच्छा उत्पादन मिलता है। बेर में अच्छी गुणवत्ता के अधिक फल उत्पादन के लिये फूल आने से पहले व फल बनने की अवस्था पर 15-20 दिन के अंतराल पर दो तीन बार सिंचाई करना लाभप्रद होता है। मार्च-अप्रैल में पौधों को पानी देना हानिकारक होता है क्योंकि इससे फलों की परिपक्वता में देरी तथा उनके फटने व रोग लगने की समस्या बढ़ जाती है।
खाद एवं उर्वरक
अच्छी वृद्धि एवं उत्पादन के लिये पौधों को उचित मात्रा में खाद एवं उर्वरक देना आवश्यक होता है। पोषक तत्वों की मात्रा क्षेत्र विशेष की मृदा की उवर्रकता पर निर्भर करती है। बलुई मिट्टी में सामान्यतः पोषक तत्वों की कमी पायी जाती है अतः बेर के अच्छे उत्पादन के लिए पौध रोपण के बाद प्रथम वर्ष में 10-15 किग्रा सड़ी हुई गोबर की खाद एवं 100 ग्राम नत्रजन, 50 ग्राम फॉस्फोरस तथा 50 ग्राम पोटाश प्रत्येक पौधे को देना चाहिए। कभी-कभी गौण पोषक तत्वों की कमी के कारण पौध वृद्धि प्रभावित होती है और अपरिपक्व फलों के गिरने की समस्या भी देखी गई है अतः इनकी पूर्ति के लिये आवश्यक गौण पोषक तत्वों का पर्णीय छिड़काव करना चाहिए। यूरिया के 1-2 प्रतिशत घोल के पर्णीय छिड़काव से बेर के फल उपज में वृद्धि तथा गुणवत्ता में देखा गया है।
अन्तःसस्यन
पौध रोपण के पश्चात् प्रारम्भिक तीन-चार वर्षों तक पौधों की कतारों के बीच बहुत सी भूमि खाली रहती है अतः इस खाली जगह से अतिरिक्त लाभ प्राप्त करने, मृदा उर्वरता को बनाये रखने एवं मृदा कटाव को रोकने हेतु अन्तःसस्यन करना चाहिए। कम पानी चाहने एवं जल्दी पककर तैयार होने वाली फसलों को उगाने से भूमि की उर्वरता, भौतिक दशा एवं जल धारण क्षमता में सुधार होता है।
पौधों की कटाई-छंटाई
प्रारम्भ के दो-तीन वर्षों में पौधों का ढांचा मजबूत करने के लिये उनकी काट-छांट करना अत्यंत आवश्यक होता है। बेर के पौधों में झाड़ीनुमा फैलने की प्रवृत्ति होती है अतः उन्हें सधाई (ट्रेनिंग) करके पेड़नुमा बनाया जाता है। ढांचा मजबूत बनाने के लिये यह आवश्यक होता है कि एक ही जगह पर एक से अधिक शाखायें न रखी जायें। एक सीधे बढ़ने वाले मुख्य तने पर भूमि की सतह से 30-40 सेमी. ऊँचाई पर समान दूरी पर एवं चारों दिशाओं में फैलने वाली 3 या 4 शाखाओं को बढ़ने देना चाहिए। पौधों की काट-छांट अप्रैल-मई में की जानी चाहिए। बीमारियों के प्रकोप से बचाव के लिये शाखाओं के कटे हुए स्थानों पर फफूंदनाशी ब्लू कापर का लेप कर देना चाहिए।
कीट एवं रोग नियन्त्रण
बेर में फलमक्खी, फलछेदक, चेफर बीटिल, माइट, दीमक आदि कीड़ों तथा चूर्णिल आसित काला धब्बा, फल सडन आदि रोगों से भारी नुकसान होता है परन्तु फलों को सबसे अधिक नुकसान फलमक्खी कीट एवं चूर्णिल आसित रोग के प्रकोप से होता है।
कुछ प्रमुख कीट व रोगों के लक्षण एवं उपाय निम्नलिखित है -
फलमक्खी
यह एक ऐसा कीट है जिसका प्रकोप बेर में फूल आने व फल बनने की अवस्था में होता है लेकिन इसका प्रभाव फलों के बड़े होने तथा पकने की अवस्था पर दिखाई पड़ता है। इसके प्रकोप से फल का आकार विकृत हो जाता है तथा फलों को काटने पर गहरे भूरे रंग का गूदा दिखाई पड़ता है जिसमें कीट का लार्वा (लट) स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। फलमक्खी से बचाव के लिये जिस समय पेड़ों में अधिकांशतः (75 प्रतिशत) फूल आ गये हों और फल बनने शुरू हो गये हो, उस समय लैम्डासायहेलोथ्रीन 5 प्रतिशत ई. सी. 0.5 मिली प्रति लीटर घोल का पहला छिड़काव करना चाहिए।
दीमक- शुष्क क्षेत्र की बलुई मिट्टी में नव रोपित पौधों में दीमक का प्रकोप अधिक होता है। यह कीट पौधों के तनों के ऊपरी एवं ऊतकीय भाग को खाकर उन्हें कमजोर व खोखला बना देते हैं जिससे पौधे अल्प अवस्था में ही सूख जाते हैं। इसके रोकथाम के लिए गड्ढों के भराव मिश्रण में फिप्रोनिल 80 प्रतिशत डब्ल्यू. जी. 0.2 ग्राम प्रति लीटर घोल का 15-20 दिनों के अन्तराल पर 2-3 छिड़काव करने चाहिए।
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माइट- यह एक हानिकारक कीट है जिसके प्रकोप से कोमल पत्तियां और फूल सूख कर गिर जाते हैं। हल्के गुलाबी या सफेद रंग के ये छोटे-छोटे कीट पत्तियों की शिराओं एवं फूलों के डन्ठलों से रस चूस कर उन्हें सुखा देते हैं। इसके नियन्त्रण के लिए अबामेक्टिन 1.9 प्रतिशत ई. सी 0.25-0.5 मिली प्रति लीटर घोल का 15-20 दिनों के अन्तराल पर 2-3 छिड़काव करने चाहिए। गंधक के घोल (0.2 प्रतिशत) का 15-20 दिनों के अन्तराल पर छिड़काव करने से भी व्याधि नियंत्रित की जा सकती है।
पाउडरी मिल्ड्यू- यह रोग लगने पर पौधों की टहनियों,पत्तियों व फलों पर सफेद चूर्ण (पाउडर) जैसा फफूंद दिखाई पड़ता है। नम वातावरण में इस रोग का अधिक प्रकोप होता है। इस रोग के लक्षण नजर आने पर डायथेन एम-45 नामक कवकनाशी को 10-15 दिनों के अन्तराल पर 3-4 बार छिड़काव करना चाहिए।
अल्टरनेरिया फल सड़न- यह एक कवकजनित रोग है जिसके प्रकोप से फलों में फलवृन्त के निकट गहरे भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं। रोग ग्रसित फल शीघ्र ही टूट कर गिर जाते हैं। इसके नियन्त्रण के लिए जिनेव या डायथेन एम-45 नामक कवकनाशी के 0.2 प्रतिशत घोल का छिड़काव लक्षण दिखाई देते ही करना चाहिए।
फलों की तोड़ाई एवं उपज
बेर में फूल आने के 150-175 दिन के बाद फल परिपक्व हो जाते हैं। यद्यपि फलों की परिपक्वता उस क्षेत्र की जलवायु एवं किस्मों पर निर्भर करती है, फिर भी फलों के रंग बदलने की अवस्था पर फलों की तोड़ाई कई बार में की जाती है। सामान्यतः फलों की तोड़ाई प्रातः काल में करनी चाहिए जिससे फलों को अधिक गर्मी से बचाया जा सके। छत्तीसगढ़ के मैदानी क्षेत्रों में एप्पल बेर दिसंबर से मार्च माह में तोड़ाई की जाती है। प्रजाति एवं बाग प्रबन्ध के अनुसार बेर के एक पूर्ण विकसित पौधे से 40-200 किलोग्राम फल उपज प्राप्त होती है।
तोड़ाई उपरान्त फलों का रख-रखाव
तोड़ाई के बाद फलों को किस्म एवं फल आकार के अनुसार छांट लेते हैं। कच्चे या ज्यादा पके, रोगग्रस्त या विकृत तथा चोट लगे या चिड़िया द्वारा खाये फलों को भी छांट देते हैं। बेर को प्रायः सफेद कपड़े या टाट के बोरों में पैक करके स्थानीय बाजार में बेचने के लिए भेजा जाता है जबकि दूरस्थ बाजार के लिए फलों को छिद्रयुक्त सी.एफ.बी. कार्टन अथवा कागज लगाकर लकड़ी के बक्सों में पैक किया जाता है। साधारण तापक्रम पर बेर के फलों को लगभग एक सप्ताह तक भण्डारित करके रख सकते हैं।
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